Wednesday, March 26, 2008

जीवन क्या है, चलता फिरता इक खिलौना है

This is a beautiful ghazal by Jagjit Singh. I was listening to it and thought of posting it here...

जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है,
दो आँखों में, इक से हँसना, इक से रोना है
चलते चलते राह में यूँहीं, रास्ता मुड़ जाता है,
जाने में, अनजाने से, रिश्ता जुड़ जाता है
किसे पता है, किस रास्ते में, कब क्या होना है,
जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है


है बीत गया जो, वह ही हर पल, आगे क्यों चलता है
राख हुए अंगारे कबके, फिर भी दिल जलता है
भूली भिसरी यादों को, अश्कों से धोना है,
जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है
जो जी चाहे, वह मिल जाए, कब ऐसा होता है
हर जीवन, जीने का, समझौता होता है
आज तक जो होता आया है, वह ही होना है
जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है


रात अँधेरी, भोर सुन्हेरी, येही ज़माना है
हर चादर में, सुख का ताना, दुःख का बाना है
आती साँस को पाना, जाती साँस को खोना है
जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है
दो चेहरों से, जीना भी, कैसी मजबूरी है
जितना जो नस्दीक है उससे, उतनी दूरी है
फूलों के सपने लेकर, काँटों पर सोना है
जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है


परछाई जैसा कोई, साँसों में चलता है
भूली भिसरी यादों को, अश्कों से धोना है
जीवन क्या है, चलता फिरता, इक खिलौना है

1 comment:

Anonymous said...

Nice One Thats reality but life never goes like this for all